Monday, May 26, 2014

नया इतिहास नहीं रचना है, कीर्ति नहीं कोई गढ़ना है


नया इतिहास नहीं रचना है, कीर्ति नहीं कोई गढ़ना है,
भारत के स्वर्णिम अतीत को पुनर्जिवित भर करना है। 
जगद्गुरु का सिंहासन वो, माँ जिस पर बैठा करती थीं,
स्वच्छ - सुसज्जित कर फिर से, माँ को अर्पित करना है।

कभी समय था, घी - दुग्ध की नदियाँ बहती रहती थीं,
उन स्त्रोतों को चिन्हित कर, फिर प्राण उन्हीं में भरना है। 

संस्कृति और समृद्धि की जिससे आभा बिखरी रहती थी, 
स्नेह डालकर उन दीपों को फिर से प्रज्जवलित करना है।  

विज्ञान - कला का परचम जिससे जग लहराया करता था,
गुरुकुल की उस परिपाटी का जीर्णोद्धार फिर करना है।
शौर्य - पराक्रम ऐसा, जिससे दिक् झुक जाया करते थे, 
सिंह-शावक सा धरा पकड़, बस एक दहाड़ फिर भरना है। 
- रवि कुमार , २६.०५.२०१४ 

(भारत के १५ वें प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को समर्पित )

Sunday, November 3, 2013

शुभ दीपावली

घी के दीप जलें न जलें, आशा के दीप जलाने हैं।
ज्ञान अग्नि से प्रज्वलित कर, श्रद्धा के दीप जलाने हैं।

हर उर में जो प्रकाश भर दे, मन-मंदिर में उजियारा कर दे,
सारी दुनिया रौशन कर दे, ऐसे दीप-थाल सजाने हैं।

घनघोर अंधेरा मिटा सके, उज्जवल भविष्य को दिखा सके,
सतत - निरंतर जलते रहें, कुछ ऐसे दीप जलाने हैं।

लक्ष्मी-गणेश की पूजा हो, पर अर्थ भी इसका ध्यान रहे ।
बढ़े ज्ञान और आय बढ़े, पर सही - गलत का भान रहे।

बुद्धि कुचक्र ना गढ़े कहीं, धन का अपव्यय न हो पाये।
जब यह  संकल्प उठे मन में तो पूजा सार्थक हो जाये।

- रवि कुमार

Sunday, September 1, 2013

आठवाँ का बोर्ड परीक्षा

खगौल, पटना, बिहार। आठवाँ  क्लास.. ए. बी. निकेतन स्कूल... अंग्रेजी माध्यम.. सि. बी. एस. ई. बोर्ड।
 
 पता चला कि 'बिहार बोर्ड' में आठवाँ में ही बोर्ड का परीक्षा होने वाला है इस बार से । हमेशा सूनते आये थे दोस्त लोगों से - 'बिहार बोर्ड में पड़ने वाला सि. बी. एस. ई. बोर्ड वाला को पढ़ा देता है।'  सच का पता नहीं.. जो सुने सो माने। कुछ हद तक तो सच्चाई भी था। कम से कम गणित में तो बिलकुल ही, जो की अपना सबसे प्रिये विषय था। तय हुआ कि आगे पढ़ाई बिहार बोर्ड से ही करना है। बिहार बोर्ड में आठवाँ बोर्ड के लिए पंजीकरण जरी है। बस यही समय है बोर्ड बदल लेने का, चूक गए तो सि. बी. एस. ई. में रह जाओगे । कहीं किसी सरकारी स्कूल से फॉर्म भरना होगा। दोनों बोर्ड का सिलेबस अलग-अलग है। कुछ महीनों में एग्जाम होगा। पूरा साल भर का सिलेबस का तैयारी करना होगा। अब जो भी हो, करना है तो करना है। एडमिशन का इंतजाम हो जाये बस। दोस्त लोगों से पता करना चालू किए। कोई जुगाड़ लगे सरकारी स्कूल में एडमिशन का। बोर्ड परीक्षा का पंजीकरण चालू है, पता नहीं एडमिशन लेगा भी कि नहीं। एक दोस्त बोला कि 'बालिका स्कूल' में एडमिशन का इन्तजाम हो सकता है। कहे - 'पागल हो गया है का रे ? बालिका स्कूल में तो लड़कीसब का एडमिशन होता है, मेरा कैसे होगा ?' बोला कि 'नहीं, स्कूल तो लड़का सब का ही है। बाजार में है स्टेशन रोड पर, चलना कल मेरे साथ एडमिशन का बात कर लेंगे। वहाँ एक टीचर से जान-पहचान भी है, काम हो जायेगा।' सोंचे कि चलो कह रहा है तो देख ही लेते हैं।
अगले दिन बालिका स्कूल पहुँचे। पहुँचने पर पता चला कि स्कूल का नाम है - "बालिगा उच्चविद्यालय"। 'बालिगा' नाम के कोई व्यक्ति (बहुत नहीं जानते हैं उनके बारे में इसीलिए महापुरुष नहीं कह रहे हैं, क्यूंकि आज तो राजीव गाँधी और इन्दिरी गाँधी के नाम पर विश्वविद्यालय तक बन चूका है) हुए थे कभी। उनके नाम पर स्कूल का नाम रखा गया। खैर, प्रधानाध्यापक से मिलना हुआ। भले आदमी थे, आसानी से 'हाँ' कह दिए। बोले कि एडमिशन सेक्शन में जा कर बोलो कि सर बोले हैं एडमिशन लेने के लिए। वहाँ पहुँचे तो टी. सी. माँगा। बोला कि बिना टी. सी. के एडमिशन नहीं होगा। सोंचे कि  ए. बी. निकेतन से टी. सी. ले आते हैं। पता चला कि सरकारी स्कूल का ही टी. सी. देना होगा, प्राइवेट स्कूल का टी. सी. मान्य नहीं है।  लगा कि ऐसा स्कूल ही क्यूँ बनाता है सब जिसका टी. सी. तक मान्य नहीं है। दोस्त था उसके जान-पहचान वाले सर के पास पहुँचे। वो बोले कि ५० रुपया में टी. सी. मिल जायेगा, एक स्कूल है उनके तरफ वहाँ से बनवा के कल ले आयेंगे।  ख़ुशी हुआ, अब तो एडमिशन पक्का है। अगला दिन एडमिशन भी हो गया। जब एडमिशन ले लिए तो 'सिंसियर स्टूडेंट' के जैसा क्लास भी जाने का सोंचे। अगला दिन सुबह में स्कूल आये। प्रार्थना में लाइन लगे, स्कूल के मैदान में। "तू ही राम है, तो रहीम है, तू करीम, कृष्ण,खुदा हुआ.…" मन प्रसन्न हो गया। क्या आनंद आया पार्थना में ! लगा कि यही स्कूल है…यहीं पढना चाहिए था शुरु से। वो कैसा स्कूल था, अंग्रीजी में  मिमियाता था सब प्रेयर के नाम पर, छत पर लाइन लगा के... कोई फिलिंग नहीं। पता नहीं क्या-क्या बोलता था, किसी को समझ में आ जाये तो बड़ी बात है। टाई के बिना प्रेयर में जाने नहीं दिया जाता था। अपने को ई 'कंठ लंगोट' कभी जँचा नहीं। लेकिन करते क्या ? स्कूल का नियम था - गला में पगहा और पैर में काला जुत्ता। मानना पड़ता था। आज लगा कि जैसे हम आजाद हो गए, अंग्रेजों से। प्रार्थना के जैसा प्रार्थना; आधे लोगों पर पेड़ का छाँव पड़ रहा है, आधे धूप में, लेकिन लगा कि सब दिल से गा रहे हैं, भावना के साथ, कोई जल्दी नहीं।
प्रार्थन खत्म हुआ। क्लासरूम में गए। सोंचें कि कोई पढ़ाने आएगा। घंटा गुजर गया। एक-दो मास्टर साहब इधर उधर घूमते नजर आये। क्लास के बगल से गुजर गए, शायद कुछ और काम रहा होगा उनको ! सामने वाले क्लास में पढ़ाई हो रहा था। आखिर हमारे क्लास में क्यूँ नहीं ? एक लड़का से पूछे - यार, क्लास होता है कि ऐसे ही चलता है ?  बोल कि हाँ, कभी कभी हो भी जाता है। बात होने लगा आस पास बठे लोगों से। पता लगा उन लोगों को कि हम एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे। सारा क्लास होता था। यदि कोई टीचर नहीं आये तो उनके जगह कोई और पढ़ाने आता था। पूरा 'डिसिप्लिन' !… बच्चा को हल्ला करने का मौका नहीं, और टीचर को आराम करने का मौका नहीं। एक सब्जेक्ट का तीन-तीन नोटबुक। डायरी रोज लाना अनिवार्य।  कभी-कभी तो डायरी चेक भी हो जाता था, सही से लिखा जा रहा है कि नहीं।
हमको भी पता चला कुछ इस स्कूल के बारे में।  एक लड़का बताया कि एक बार एक सर एक लड़का को क्लास में खड़ा किये। कुछ सवाल पूछे, बेचारा नहीं बता सका, तो सर गुस्सा में बोले कि पढ़ते क्यूँ नहीं हो, करते क्या हो घर पर ? बच्चा जवाब दिया - 'सर, कुट्टी काटते  हैं'। बात सही भी था, बेचारा मजाक नहीं कर रहा था। इसी तरह एक बार अंग्रजी के मास्टर साहब एक लड़का को क्लास में खड़ा किए। सोंचे होंगे पढ़ाने से पहले देख लिया जाये कि इनको पहले से कहाँ तक पता है। पूछे - " 'नाउन' किसे कहते हैं ?" लड़का खूब सोंचा, शायद कभी ऐसा कुछ सुने हों। बहुत जोर देने पर उसको कुछ याद आया। बताया - "सर, नउआ के मेहरारू को नाउन कहते हैं"। अद्भुत जवाब !

 अब तो इस स्कूल से मेरा अच्छा परिचय हो चूका था। फॉर्म भरने का तारीख पता किए और घर आये।
घर में ही पढ़ाई करना शुरू किए। परीक्षा का डेट आ चूका था और बाजार में 'एटम बम' बिकने लगा था (ह्न, घबराईये नहीं, ऐसा नहीं है कि बिहार में परमाणु बम बाजार में बिकने लगा है ! 'एटम बम' नाम से गेस पेपर छपता है, बोर्ड एग्जाम के लिए)। हाथ में एटम बम ले के बैठ जाते छत पर कुर्सी लगा के। एग्जाम हुआ, रेलवे स्कूल में सेण्टर पड़ा। उम्मीद था कि अच्छा नंबर आएगा। उम्मीद से कुछ ज्यादा ही अच्छा नंबर आया। अंकपत्र देख करके पुलकित हुए.. यज्ञ सफल हुआ। फिर नौवा क्लास में कहीं न कहीं तो एडमिशन लेना ही था ,बिहार बोर्ड के स्कूल में जिसमें पढाई होता हो। रेलवे स्कूल था पास में, लेकिन पारिवारिक सलाहकारों के मद्देनजर 'मून अकादमी' में एडमिशन लेना पड़ा, फिर प्राइवेट स्कूल...यहाँ भी 'नेकटाई' का प्रचलन था लेकिन उतना ज्यादा गला नहीं दबता था जितना ए. बी. निकेतन में। दसवाँ तक यहाँ पढ़ना हुआ... दूसरी बार फिर बोर्ड परीक्षा, दसवाँ  में ! 
- रवि 

Saturday, July 28, 2012

समाजोत्थान में शिक्षण संस्थानों की भूमिका

"आप बाहर में प्रचार कीजिये, ये education centre है, इन सब चीजों के लिए सही जगह नहीं है ", यही जवाब मिलता है तथाकथित बुद्धिजीवियों के द्वारा जब आप किसी university / कॉलेज या अन्य शिक्षण संस्थानों में भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन या अन्य सामाजिक मुद्दा उठाते हैं | क्या शिक्षण संस्थानों की इन सब में कोई भूमिका नहीं होनी चाहिए ?

इसी भारत देश में एक समय था जब तक्षशिला विश्वविद्यालय का एक आचार्य 'चाणक्य' समय की आवश्यकता को समझते हुए 'चन्द्रगुप्त' एवं अन्य छात्रों के साथ निकल पड़ता है देश को यवनों की दासता से मुक्त करने के लिए और अखण्ड भारत का निर्माण करता है | आज हम कहते हैं कि विश्वविद्यालय सिर्फ कागज-कलम चलाने के लिए है इसका सामाजिक समस्यायों से क्या लेना-देना ? आज भी देश चाणक्य और चन्द्रगुप्त माँग रहा है देश को भ्रष्ट राजतंत्र और कुटिल राजनेताओं की दासता से मुक्त कराने के लिए | अंतर बस इतना है कि तब तीर और तलवारों से युद्ध हुआ करता था, आज बुद्धि, विचार, संचार और सजगता के अस्त्र-शास्त्रों से , पर आदर्श तो जो हमारा था, वही है और वही रहना चाहिए |

|| उठो जवान देश के वसुंधरा पुकारती, देश है पुकारता, पुकारती माँ भारती ||

Friday, April 27, 2012

जीवन

अकेले आये इस दुनिया में;
खाली हाथ, नंगे बदन,
न घर, न खेत,
अशक्त, असक्षम ,
अशिक्षित, असभ्य ।

पाये यहाँ, सब कुछ;
माता, पिता,
गुरु, दोस्त,
घर, संसार,
प्यार, ज्ञान,
धन, सम्मान,
कला, प्रसिद्धि ।

चले यहाँ से लेकर;
कर्म, सिर्फ कर्म ।

Sunday, April 15, 2012

विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय एक अनिवार्य आवश्यकता

विज्ञान और अध्यात्म के योग की जितनी आवश्यकता आज है उतनी शायद पहले कभी नहीं थी | आज समाज में दो तरह के लोगों का बाहुल्य है - एक तो वो लोग हैं जो भौतिकवादी विज्ञान को ही सब कुछ मानते हैं, भौतिकवादिता के पीछे आँख मूंद कर दौड़े जा रहे हैं, अध्यात्म उनको निरर्थक प्रतीक होता है; और दूसरी तरफ वो लोग हैं जो रूढ़ीवादी मानसिकता से ग्रसित हैं, बिना सोंचे विचारे अंधी परम्परों के पीछे पड़े हैं | दोनों में से कोई भी स्थिति सही नहीं है | पहला वर्ग अध्यात्म के बिना लंगड़ा है तो दूसरा विज्ञानवाद के बिना अंधा | भौतिकता आवश्यक है, तो अध्यात्म भी अनिवार्य है | क्या कोई ऐसा इन्सान संभव है जो कह सके कि हम सिर्फ भौतिकता से ही जी लेंगे ?? आज तक कोई ऐसा नहीं हुआ जिसे भावना, प्रेम, मित्रता, स्नेह आदि की जरूरत न पड़ी हो | ये अध्यात्म के विषय हैं | इनके बिना मानव जीवन संभव नहीं | गलती तब हो जाती है जब लोग अध्यात्म को सिर्फ पूजा-पाठ मात्र समझ लेते हैं | मंदिर गए, १२ रूपये की प्रसाद चढ़ा दी और आशा करते हैं भगवान् मेरा अमुक काम कर दे, केस जीता दे या परीक्षा में पास करा दे इत्यादि इत्यादि | भगवान् यदि झूठा केस जिताने लगे और बिना पढ़े पास कराने लगे तो उन्हें भगवान कहना ही उचित नहीं होगा | हाँ, मंदिर और पूजा-अर्चना का अपना महत्त्व है, वो एक अलग विषय है | यहाँ कहना ये है कि बहुत सारी परमपराएं बिना जाने समझे ही अपना ली जाती हैं, जो गलत है | आधारहीन परम्पराएँ समाप्त होनी ही चाहियें | लेकिन ऐसा भी नहीं है कि आज जितने प्रचालन हैं सब निरर्थक हैं, जैसा भौतिकवादी लोग मान बैठे हैं | ध्यान, साधना, जप, तप का अपना विज्ञान है | इसका भी लाभ आदमी उसी तरह उठा सकता है जैसे मोबाइल फ़ोन और कंप्यूटर का | हाँ, अब इस्तेमाल करना नहीं आये तो निश्चित रूप से सब निरर्थक ही मालूम पड़ेगा | अगरबती दिखा देने से न तो कंप्यूटर से ही कुछ मिलने वाला है न देवी-देवता के तस्वीर से | कंप्यूटर का लाभ लेने के लिए उसे चलाना सीखना पड़ता है | उसी तरह प्रतिमा / प्रतीक-चित्रों से लाभ लेने का तरीका सिखाना आवश्यक है | हाल ही में एक मित्र से सुना - " मैं धार्मिक मान्यताओं में विश्वास नहीं करता | वैसे मेरे पास भी गणेश जी का एक चित्र है, लेकिन इसीलिए रखे हुए हैं क्यूंकि मम्मी दे दी थी कि रख लेना |" काश ऐसा हुआ होता कि मम्मी तस्वीर देने के साथ यह भी बताती कि इसका मतलब क्या है ? इससे लाभ कैसे उठाया जा सकता है ? शायद उन्होंने यह मान लिया होगा कि बेटा इतना पढ़ा-लिखा है, समझदार है, कुछ तो अकाल लगाएगा, कुछ तो समझने का प्रयास करेगा कि क्यूँ गणेश जी की तस्वीर दी रही है | बेटा को यदि समय मिला होता दो क्षण सोंचने का तो शायद समझ सका होता कि गणेश का तात्पर्य ज्ञान से है | माँ ने कहा है- 'बेटा, ज्ञान अर्जित करना और उसका वैसा उपयोग करना जिससे देवत्व उभरे | भगवन गणेश अपने ज्ञान के कारण प्रथम पूजा के अधिकारी बने | तुम भी ज्ञान का महत्त्व समझना, बुद्धि का विकास करना और सही रास्ते पर लगाना जिससे तुम्हें कृति प्राप्त हो | यह चित्र एक पोस्ट-इट-नोट की तरह से है जो सदा तुम्हें इन बातों का स्मरण करता रहेगा |' यदि बेटे को ये बात समझ में आ जाती तो शायद माँ का दिया वो चित्र सार्थक हो जाता | गणेश भगवान के विषय में सुना वर्षों पहले की एक बात याद आती है | उस समय मैं पटना में था और प्रज्ञा युवा मंडल के साप्ताहिक कार्यक्रम में डॉ. अजक कुमार आये थे, जो इंडियन मेडिकल एसोसियेसन के चीफ थे और करीब २० साल अमेरिका में कार्य कर चुके थे | उन्होंने कहा था - "मैं हमेशा अपने पास एक गणेश जी की तस्वीर रखता हूँ | इससे मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है | जैसे- गणेश जी नाक बहुत बड़ा है, यह हमें सिखाता है कि अपना सेंसिंग-कैपेबिलीटी बढ़ा के रखो | आस-पास क्या चल रहा है उसका ध्यान रखो | मैं हमेशा अपने विषयों के लिए चौकन्ना रहता हूँ |" उन्होंने एक उदहारण के तौर बताया - "एक बार मैं एक मीटिंग में गया था | वहाँ एक वक्ता मुझे एक नए खोज के बारे में बताने लगे | उनके शुरू करते ही मैंने उन्हें आगे की बात बता दी, तो उन्होंने आश्चर्य प्रकट किया - अरे, आपको पहले से पता है ! मैंने जवाब दिया कि यह कल ही प्रकाशित हो चूका है और मैं पढ़ चूका हूँ |" यह सीख गणेश जी के लम्बे नाक का है | इसी तरह उन्होंने उनके गणेश जी के बड़े उदार, बड़े कान इत्यादि की व्याख्या की | यदि हम भी सोंचने का प्रयास करें कि इन प्रतीकों से क्या शिक्षाएँ मिलती हैं तो शायद इनसे जुड़े अध्यात्म का कुछ मतलब समझ में आये | ....विज्ञान और अध्यात्म के समन्वित स्वरूप में ही मानवहित है |.....

Monday, April 4, 2011

'धर्म' से नाक- भौं ना सिकोड़ें, समझने का प्रयास करें !

आज भारत में अधिकांश तथाकथित पढ़े-लिखे लोग 'धर्म' को निरर्थक और 'संस्कृति' को पिछड़ापन का पर्याय मानने लगे हैं | मूल कारण है, बचपन से ही उन्हें मानसिक रूप से अंग्रेजों के गुलाम बनाये रहने वाली शिक्छाप्रणाली में ही पढ़ना पड़ा, और घर में टी.वी. पर नटों से 'एडवांस' बनने का तरीका सिखा, बस | माता-पिता ने भी 'बड़ा आदमी' बनने और खूब पैसा कमाने के ही सपने दिखाए, धर्म और संस्कृति की बात करना ही दूर रहा | यदि कहीं कोई 'धर्म ' की चर्चा करता हुआ मिला भी तो उससे यही सुन पाया कि धरती के ऊपर कहीं स्वर्ग है और धर्म वहाँ जाने का साधन, जिस पर विश्वास करना उसके लिया संभव नहीं | किसी ज़माने में यह बात कहना भी लाभकारी रहा होगा पर आज के समय में सिर्फ असली रूप में कहना ही सही है | धर्म का अर्थ है - गुण | जैसे पानी का धर्म है, तरल होने | आग का धर्म है, गरम होना | यदि आग गरम ना हो तो हम उसे आग कहेंगे ही नहीं | पानी तरल ना हो तो हम उसे कुछ और कह सकते हैं, पानी नहीं | उसी तरह से मानव का धर्म क्या है , उसे किन गुणों को रखना चाहिए उसी की व्याख्या 'धर्म' के नाम से जानी जाने लगी | अलग-अलग लोगों ने, अलग-अलग जगह पर, अलग-अलग समय में इसकी व्याख्या करने की चेष्टा की जो अलग-अलग नामों से प्रचलित हुए | सबके मूल में एक ही तत्त्व है जिसे हम 'मानवता' कहते हैं | इस तरह, किसी भी धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति मूल रूप से सभी धर्मों का पालन एक साथ करता है और जो किसी भी धर्म को नहीं समझता वह धर्म के नाम पर झगड़ा | धर्म का एक और अर्थ है - कर्त्तव्य | लेकिन यह भी पहले वाले अर्थ से अलग नहीं बल्कि उसी का एक अंग है | कर्तव्यों की व्याख्या को भी धर्म कह सकते हैं , और कर्त्तव्य-पालन को धर्म-पालन |

अब यदि धर्म मात्र इतना ही है तो फिर इसमें देवी-देवताओं की क्या आवश्कता ? हम राम को, कृष्ण को , रामकृष्ण को, बुद्ध को क्यूँ मानें ? उनके प्रति श्रधा की क्या आवश्यकता ? आवश्यकता है, हम जिसके प्रति श्रधा रहते हैं उसके गुणों को धारण करते चले जाते हैं | हम कैसे मान लें कि श्रधा रखने से गुण आने लगते हैं ? यह सत्य है, मान लीजिये, प्रयोग से साबित किया हुआ है | पिता के प्रति श्रधा पुत्र में पिता के गुण भर देता है | आज इसके पीछे का सिद्धांत दुनिया के सामने नहीं है, इसका यह तात्पर्य नहीं कि बात गलत है | न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत दिया, उससे पहले भी सेव धरती पर ही गिरता था, आकाश में नहीं जाता था | ..... आगे फिर कभी ....